हिंदी शायरी : कल्पना के इस शहर में
कल्पना के इस शहर में हम उनको ढूंढ रहे हैं
तुम मूड में नहीं थे तो क्यू बनाया मुझे रब,
मिट्टी दुबारा गुथो और फिर से बनाओ मुझे।
वो जवानी में ही मर गया था..
कमाल था लाश बुढ़ापे तक चलती रही।
ये आपका चेहरा है या प्याज के छिलके,
एक चेहरा उतारा तो सौ और चेहरे मिले।
कभी जिंदगी के धागे टूट जाए तो हमारे पास आना..
हम हौसलों के दर्जी है मुफ्त में रफू करते हैं।
हसरत से देखते हैं हम माज़ी को इस तरह,
जैसे के लौट आएंगे जो दिन गुज़र गए।
मुझको शर्मिंदा कर जाए, जब वो नज़र झुकाकर जाए,
मेरी बेटी सी इक लड़की, मुझसे क्यूँ घबरा कर जाए!
और सो लेने दो थोडा़ सा मेरी आँखों को,
बड़ी मुद्दत के कई ख़्वाब सजे हैं इनमें!
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