2 लाइन शायरी : हमारी अफवाह के धुंए वहीं से उठते है
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| 2 - लाइन शायरी |
हमारी अफवाह के धुंए वहीं से उठते है,
जहाँ हमारे नाम से आग लग जाती है।
यूँ ही रिहा नहीं हो सकेंगे जहन से तुम्हारे हम,
बड़ी सिद्दत से तुम्हारे दिल में घर बनाया है।
कितनी अजीब है इस शहर की तन्हाई भी,
हज़ारो लोग है मगर फिर भी कोई उस जैसा नहीं।
दस्तक और आवाज तो कानो के लिए है,
जिसे रूह जी जाए खामोशी उसे कहते हैं।
वक़्त की तरह तुम भी ना ठहरे मेरी ज़िन्दगी में,
तुम गुज़रते रहे और हम इंतज़ार करते रह गए।
लाकर तेरे करीब मुझे दूर कर दिया,
तकदीर भी मेरे साथ एक चाल चल गई।
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